अपनाताजपुर। फाल्गुन का महीना आते ही हवा में एक अलग सी मिठास घुलने लगती है। सरसों के पीले खेत, ढोलक की थाप और गलियों में गूंजते फाग के गीत—ये सब मिलकर होली के आगमन का संकेत देते हैं। होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि यादों, रिश्तों और आपसी प्रेम का उत्सव है।

यदि हम होली के इतिहास की ओर देखें तो यह पर्व प्राचीन कथाओं से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि इस दिन भक्त प्रह्लाद की आस्था की जीत और होलिका के अहंकार का अंत हुआ था। इसी कारण होलिका दहन बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। वहीं ब्रज क्षेत्र में होली का संबंध भगवान कृष्ण और राधा की रास-लीला से जोड़ा जाता है, जहाँ रंग प्रेम और स्नेह का माध्यम बनते हैं।

अपनाताजपुर में भी वर्षों पहले होली का स्वरूप कुछ अलग हुआ करता था। सुबह होते ही बच्चे पिचकारी लेकर गलियों में निकल पड़ते थे। घर-घर जाकर रंग लगाना, गले मिलना और “बुरा न मानो होली है” कहना एक परंपरा थी। महिलाएं घरों में गुजिया, मालपुआ और दही-बड़े बनाती थीं, जिनकी खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल जाती थी। दोपहर तक पूरा कस्बा रंगों से सराबोर हो जाता था। बुजुर्ग बताते हैं कि पहले होली में प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल होता था—टेसू के फूलों से बना केसरिया रंग और हल्दी से तैयार पीला रंग। ढोलक और मंजीरे की धुन पर फाग गाए जाते थे, जिनमें प्रेम, हास्य और सामाजिक संदेश छिपे होते थे। उस समय त्योहार में दिखावा कम और अपनापन ज्यादा था।

समय के साथ होली का स्वरूप बदला है। बाजार में केमिकल वाले रंगों और डीजे की तेज आवाज ने पारंपरिक फाग की जगह ले ली है। फिर भी अपनाताजपुर के कई मोहल्लों में आज भी लोग पुरानी परंपराओं को जीवित रखने का प्रयास कर रहे हैं। इस वर्ष स्थानीय युवाओं ने मिलकर “इको-फ्रेंडली होली” का संकल्प लिया है। उन्होंने प्राकृतिक रंगों का उपयोग करने और पानी की बर्बादी रोकने का संदेश दिया है।

कल शाम कस्बे के मुख्य चौक पर होलिका दहन का आयोजन किया गया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी ने मिलकर अग्नि की परिक्रमा की और सुख-समृद्धि की कामना की। वातावरण में भक्ति और उल्लास का सुंदर संगम देखने को मिला। कई परिवारों ने इस अवसर पर पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को गले लगाया। होली की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यह दिलों की दूरी मिटाती है। रंगों का यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में विविधता ही असली खूबसूरती है। जैसे अलग-अलग रंग मिलकर एक सुंदर इंद्रधनुष बनाते हैं, वैसे ही समाज के विभिन्न लोग मिलकर एक सशक्त समुदाय बनाते हैं।

अपनाताजपुर में इस बार की होली सिर्फ रंगों की नहीं, बल्कि उम्मीदों की होली है। लोग चाहते हैं कि आपसी भाईचारा और प्रेम बना रहे। त्योहार का असली संदेश यही है कि हम एक-दूसरे के जीवन में खुशियों के रंग भरें।

अंत में यही कहा जा सकता है कि बदलते समय के बावजूद होली की आत्मा आज भी जीवित है। अपनाताजपुर की गलियों में गूंजती हंसी, बच्चों की शरारतें और बुजुर्गों का आशीर्वाद इस बात का प्रमाण है कि रंगों का यह त्योहार सदियों तक हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना रहेगा।

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